अध्याय (Chapter) 1: ग्रहण का आरंभ (The Beginning of the Eclipse)
भूमिका: एक अनसुना सत्य
‘The Bornfighter’ उस इंसान की गाथा है जिसे दुनिया ने हार मान लेने के लिए मजबूर किया, लेकिन जिसकी रूह ने झुकने से इनकार कर दिया। अक्सर कहा जाता है कि परिवार और समाज एक इंसान की ताकत होते हैं, पर उस शख्स का क्या—जिसकी ढाल भी वो ख़ुद है और तलवार भी? यह कहानी उस क्षण की गवाही है जब परिस्थितियाँ उसे चारों तरफ से घेर लेती हैं। यहाँ पात्र की खामोशी उसकी कमजोरी नहीं, बल्कि उस तूफ़ान की तैयारी है जो ‘अज्ञात’ (Unknown) गलियों से निकलकर एक ‘अनसुना’ (Unheard) इतिहास रचने वाला है। वह भीड़ का हिस्सा कभी नहीं था, क्योंकि उसकी किस्मत किसी के रहमों-करम पर नहीं, बल्कि उसके जन्मजात जुझारूपन पर लिखी गई थी। जब सहारे के सारे हाथ पीछे हट जाते हैं, तभी असली ‘BornFighter’ का जन्म होता है। यह सफर है शून्य से शिखर की ओर उस अकेले कदम का, जिसने पीछे मुड़कर देखना छोड़ दिया है।”
अध्याय (Chapter) 1: ग्रहण का आरंभ (The Beginning of the Eclipse)
Episode 1
सन् 2000 के आसपास की बात है, एक पण्डित जी कर्मकाण्ड किया करते थे, इसके लिए वे विभिन्न स्थानों पर लोगों की समस्या के निराकरण के लिए जाया करते थे। उनके साथ सदैव एक बच्चा दिखाई देता था, वह उनका पोता था।
एक बार वे कर्मकाण्ड के लिए किसी कस्बे में गए जहाॅं वे अचानक अस्वस्थ हो गए। किसी सज्जन ने उन्हें अस्पताल के लिए ऑटो में बिठाया और ऑटो वाले से उन्हें अस्पताल छोड़ देने के लिए कहा। ऑटो वाले ने दोनों को अस्पताल उतारा और चला गया।
अस्पताल में पहुॅंचते ही प्रश्नों की जैसे बौछार होने लगी। पूछा गया, क्या हुआ इन्हें? कहाॅं के रहने वाले हो? तुम्हारा नाम क्या है?
घबराया हुआ बच्चा अवाक रह गया। उस समय वह कुछ बोल नहीं पा रहा था।
अपनी घबराहट को सम्भाल कर वह बस इतना ही बोला “मेरे बाबा को ठीक कर दीजिए” और रोने लगा।
दिल में रहूॅंगा, जिगर में रहूॅंगा जिधर तू रहेगी उधर मैं रहूँगा तेरे नैन में रहूॅंगा, तेरे नक्श में रहूॅंगा तू जहाॅं भी रहे, तेरे अक्स में रहूॅंगा ज़र्रे-ज़र्रे में रहूॅंगा इस कायनात के मैं शायर हूॅं, मैं हर लफ़्ज़ में रहूॅंगा
मैं रहूँगा सब कुछ होने पर मैं रहूँगा सब कुछ खोने पर चाहे आबाद रहूॅंगा चाहे बर्बाद रहूॅंगा मेरे बाद भी रहूॅंगा तेरे बाद भी रहूॅंगा
इधर मैं रहूँगा उधर मैं रहूँगा मगर मैं रहूँगा अमर मैं रहूँगा
रहने के लिए, मैं मोहताज़ नहीं हूॅं जिस्म का रहने के लिए, मेरा वजूद है ख़ास क़िस्म का
Everything that is readily accessible to all tends to lose its perceived value, whereas scarcity often enhances its worth. This applies to everything, whether a person, place, or thing.
In short, “cheaper is everywhere but worthy is rare.”
सस्ता सुलभ है, अनमोल दुर्लभ है।
आइये इसे विस्तार से समझें।
मेरे द्वारा जो उपरोक्त विचार व्यक्त किया गया है, वह बहुत ही गहरा है और मानव व्यवहार की एक बड़ी सच्चाई को दर्शाता है। यह गागर में सागर जैसा है। यह विचार किसी एक क्षेत्र तक सीमित नहीं है, बल्कि अर्थशास्त्र, मनोविज्ञान और सामाजिक विज्ञान के कई प्रसिद्ध सिद्धांतों से सीधे जुड़ता है।
मेरे इस कथन— “जो सुलभ है उसका मूल्य कम हो जाता है, और जो दुर्लभ है उसका मूल्य बढ़ जाता है”—को हम निम्नलिखित सिद्धांतों के तहत समझ सकते हैं: 1. दुर्लभता का सिद्धांत (Principle of Scarcity)–
•मनोविज्ञान• मनोविज्ञान में रॉबर्ट सियाल्डिनी (Robert Cialdini) ने प्रभाव और अनुनय (Influence) के अपने सिद्धांतों में इसका विस्तार से वर्णन किया है। यह क्या कहता है?: जब कोई चीज़ कम मात्रा में उपलब्ध होती है या उसे हासिल करना मुश्किल होता है, तो इंसान का दिमाग़ उसे अधिक क़ीमती और बेहतर मानने लगता है। मेरे विचार से जुड़ाव:“Worthy is rare”(योग्य दुर्लभ होता है) सीधे तौर पर इसी मनोवैज्ञानिक सच को दर्शाता है। हम उस चीज़ या व्यक्ति को खोने से डरते हैं जो हर जगह उपलब्ध नहीं है।
2. माॅंग और आपूर्ति का नियम (Law of Demand and Supply) –
•अर्थशास्त्र• यह पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था का मूल आधार है। यह क्या कहता है?: यदि किसी चीज़ की आपूर्ति (Supply) बहुत अधिक है और वह हर जगह आसानी से उपलब्ध है, तो उसका मूल्य (Price/Value) गिर जाता है। इसके विपरीत, जिस चीज़ की आपूर्ति सीमित होती है, उसकी माॅंग और क़ीमत दोनों बढ़ जाती हैं। मेरे विचार से जुड़ाव:“Cheaper is everywhere” (सस्ता हर जगह है) यानी जिसकी सप्लाई असीमित है, उसकी क़द्र कम होती है।
3. मूल्य का विरोधाभास (Paradox of Value / Diamond-Water Paradox) –
•दर्शन और अर्थशास्त्र• यह सिद्धांत प्रसिद्ध अर्थशास्त्री एडम स्मिथ द्वारा चर्चा में लाया गया था। यह क्या कहता है?: पानी हमारे जीवन के लिए बेहद ज़रूरी है, लेकिन यह आसानी से मिल जाता है (Readily accessible), इसलिए यह बहुत सस्ता है। दूसरी ओर, हीरा जीवन के लिए बिल्कुल ज़रूरी नहीं है, लेकिन वह बहुत दुर्लभ (Scarce) है, इसलिए उसका मूल्य अत्यधिक है। मेरे विचार से जुड़ाव: यह ठीक इस बात को प्रमाणित करता है कि “उपयोगिता चाहे जो हो, समाज अक्सर ‘दुर्लभता’ को ही ‘मूल्य’ का पैमाना मान लेता है।“
4.‘कम उपलब्धता का प्रभाव’ (Playing Hard to Get / Anti-Climax Principle)
•मानवीय संबंध• जैसा कि मैंने लिखा है कि यह व्यक्तियों (Persons) पर भी लागू होता है। समाजशास्त्र और संबंधों के मनोविज्ञान में इसे “आकर्षण का दुर्लभता सिद्धांत” भी कहते हैं। यह क्या कहता है?:जो व्यक्ति हर समय, हर किसी के लिए उपलब्ध (Too available) रहता है, लोग अक्सर उसकी बातों और समय को ‘फॉर ग्रांटेड’ (हल्के में) लेने लगते हैं। जब कोई व्यक्ति अपनी सीमाओं (Boundaries) को बनाए रखता है और हर जगह आसानी से सुलभ नहीं होता, तो उसकी उपस्थिति का सम्मान बढ़ जाता है। मेरे विचार से जुड़ाव:“किसी जगह बार-बार जाओगे तो कम चाहे जाओगे जबकि जितना कम जाओगे उतना अधिक चाहे जाओगे।”
निष्कर्ष: मेरी ये पंक्तियाँ मुख्य रूप से ‘दुर्लभता के सिद्धांत’ (Principle of Scarcity) और ‘मूल्य के विरोधाभास’ (Paradox of Value) का एक सुंदर, संक्षिप्त और व्यावहारिक रूप हैं। यहाँ मैंने एक गहरे आर्थिक और मनोवैज्ञानिक नियम को बहुत ही सरल और प्रभावी शब्दों में पिरोया है। यह आपके व्यावहारिक जीवन में बहुत काम आयेगा।
सॅंघर्ष चाहे कितना भी रहा मेरे जीवन में जुझता रहा कोई पाप न रखा मैंने मन में नासमझ था, असहज था, मैं रूऑंसा था क्योंकि ग्रहण लग गया था मेरे बचपन में
मेरी अनसुनी कहानी से लोग अंजान है अभी गुमनाम हूॅं, मेरी न कोई पहचान है आज भी ईमान वाला हूॅं कुछ को पता है चाहे दुनिया में लोग कितने ही बेईमान हैं
कई लोग मिले फ़िर भी भीड़ में खोया हूॅं कोई नहीं था सहारा तन्हा-तन्हा रोया हूॅं नदारद रही है नींद मैंने ख़्वाब नहीं देखे कैसे ख़्वाब देख लूॅं मैं ढॅंग से न सोया हूॅं
लोगों की बातों को सुहाना सपना माना तन्हाई में मैंने गैरों को भी अपना माना लोग जुड़े मुझसे बस ख़ुदगर्ज़ी के लिए मैंने परायों को भी प्राणों जितना माना
मैं वादा करता हूॅं अगर कामयाब हो जाऊॅंगा मैं अपने जैसे लोगों के हौसले को बढ़ाऊॅंगा मरके रूह को नया जिस्म मिलता है यहाॅं पे हर बार मरके मैं यहाँ नया जन्म ले आऊॅंगा
आज के दौर में हम जब भी किसी सुंदर स्थान की यात्रा करते हैं या किसी उत्सव का हिस्सा बनते हैं, तो उन पलों को कैमरे में सहेजने का मोह स्वाभाविक है। मुझे भी यह पसंद है। लेकिन अक्सर मैंने गौर किया है कि जब मेरा पूरा ध्यान लेंस के पीछे होता है, तब मैं उन पलों की जीवंतता को महसूस करने से चूक जाता हूँ।
यहीं एक द्वंद्व जन्म लेता है—कैमरे की छवि या मन की स्मृति?
यक़ीनन, दोनों का अपना महत्व है। एक तस्वीर बीते वक्त का दस्तावेज़ है, तो स्मृति उस वक्त का अहसास। लेकिन मेरी प्राथमिकता अब बदलने लगी है। मैं पहले उन क्षणों में पूरी तरह डूबकर उनका आनंद लेना पसंद करता हूँ। जब मेरा मन उस सुंदरता से तृप्त और प्रफुल्लित हो जाता है, तब मैं कैमरे का रुख़ करता हूँ। क्योंकि मेरा मानना है कि जो पल रूह में न उतर सका, उसे गैलरी में सहेजने का क्या फ़ायदा?
“क्या आपकी गैलरी उन पलों से भरी है जिन्हें आपने जिया ही नहीं? आप किसे चुनेंगे—परफेक्ट शॉट या परफेक्ट अहसास?”
मैंने अपने आसपास के लोगों लोगों की एक विशेष प्रवृति का अवलोकन किया है कि ये लोग सदा उनके साथ फ़ोटो खिंचवाने के लिए लालायित रहते हैं जो लोग इन्हें नहीं जानते, या जानते हैं तो ये उनके चाटुकार होते हैं। किन्तु ऐसे लोग जिनके साथ में फ़ोटो खिंचवाना चाहिए उन्हें यह लोग योग्य नहीं मानते हैं, उन्हें ये लोग सफल और प्रसिद्ध नहीं मानते। यह एक प्रकार की मानसिक दासता या चाटुकारिता ही है। किसी सफल और प्रसिद्ध के साथ फ़ोटो खिंचवाने से कुछ नहीं होता है, हम जैसे थे वैसे ही रहते हैं। जिसे दुनिया ‘सफलता’ का नाम देती है, उसके पीछे भागती भीड़ अक्सर यह भूल जाती है कि किसी चमकते सितारे के साथ खड़े हो जाने से आपकी अपनी चमक नहीं बढ़ जाती।
मैंने अब तक केवल मोहित भाई ट्रेवलर और कुछ मित्रों के साथ ही फ़ोटो खिंचवाया है और वह भी उनकी सादगी और विनम्रता के कारण।
हमारी पहचान किसी चित्र से नहीं, हमारे चरित्र से होनी चाहिए। हमारी छवि कैमरे की अपेक्षा हम जिनसे मिलें उनकी स्मृति में होनी चाहिए। किसी अपरिचित व्यक्ति के साथ मात्र फ़ोटो खिंचवाकर गौरवान्वित होना व्यर्थ है;वास्तविक गौरव तब है जब वह व्यक्ति आपके व्यक्तित्व से परिचित हो।
किसी के साथ फ़ोटो खिंचवाकर सोशल मीडिया प्लेटफ़ॉर्म पर स्टेटस अपडेट करने से अधिक अच्छा यह है कि अपना स्टेटस अपग्रेड किया जाए।
“हमारी पहचान किसी चित्र से नहीं, हमारे चरित्र से होनी चाहिए।
हमारी छवि कैमरे की अपेक्षा हम जिनसे मिलें उनकी स्मृति में होनी चाहिए।
किसी के साथ फ़ोटो खिंचवाकर सोशल मीडिया प्लेटफ़ॉर्म पर स्टेटस अपडेट करने से अधिक अच्छा यह है कि अपना स्टेटस अपग्रेड किया जाए।”
•व्यक्ति ‘A’: वह आपके लिए पलकें बिछा देता है। आपसे बात करते समय उसकी वाणी में शहद है और व्यवहार में आदर। लेकिन, जैसे ही वह आपसे दूर जाता है, वह अन्य लोगों, बेजुबान जानवरों और प्रकृति के प्रति बेहद कठोर और संवेदनहीन हो जाता है।
•व्यक्ति ‘B’: वह आपके साथ रूखा व्यवहार करता है। शायद वह आपकी उपेक्षा करे या आपसे कड़वाहट से बात करे। लेकिन, वही व्यक्ति समाज के लिए समर्पित है, सड़क पर घायल जानवर को देखकर रुक जाता है और प्रकृति का सच्चा प्रेमी है।
आपका चुनाव (The Poll):
इनमें से किसे आप ‘वास्तविक अच्छा व्यक्ति’ कहेंगे?
विकल्प 1: वह जो मेरे प्रति अच्छा है (क्योंकि मेरे लिए मेरा अनुभव सर्वोपरि है)।
विकल्प 2: वह जो सृष्टि के प्रति अच्छा है (भले ही वह मेरे प्रति बुरा हो)।
तार्किक उत्तर (The Logical Insight):
सही उत्तर: ‘B’ नामक व्यक्ति,
‘B’क्यों?
यहाँ तर्क (Logic) समझिए:
•स्वार्थ बनाम स्वभाव: व्यक्ति ‘A’ का अच्छा व्यवहार एक ‘निवेश’ (Investment) हो सकता है। वह आपसे किसी फ़ायदे की उम्मीद में अच्छा हो सकता है। उसका असली स्वभाव वह है जो वह उन लोगों या जीवों के साथ करता है जिनसे उसे कोई लाभ नहीं मिलना (जैसे जानवर या प्रकृति)।
•नैतिकता का पैमाना: किसी व्यक्ति की अच्छाई की असली परीक्षा तब होती है जब वह उनके साथ कैसा व्यवहार करता है जो उसे बदले में कुछ नहीं दे सकते।
•व्यक्तिगत मतभेद: व्यक्ति ‘B’ का आपके प्रति बुरा व्यवहार किसी ‘व्यक्तिगत कारण’ या ‘वैचारिक मतभेद’ से हो सकता है, लेकिन उसका ‘सार्वजनिक आचरण’ प्रमाणित करता है कि उसके संस्कार और उसकी आत्मा शुद्ध है।
निष्कर्ष: जो केवल आपसे अच्छा है, वह अपने स्वार्थ हेतुचतुर हो सकता है। जो पूरी दुनिया के लिए अच्छा है, वही वास्तव में चरित्रवान है।
“किसी की वास्तविकता जाननी है, तो उसे वहाॅं देखो जहाँ उसे कोई देख न रहा हो।”
अध्याय (Chapter) 1: ग्रहण का आरंभ (The Beginning of the Eclipse)
The Unknown and Unheard:
The BornFighter-I |Season 1, Chapter 1, Episode 3
Episode 3
अस्पताल में दूसरा दिन: बच्चे ने अपने दादाजी के हाथ पर देखा कि नस पर सूजन आ गई है और ख़ून बह रहा है।
वह दौड़ा-दौड़ा वार्ड इंचार्ज के पास गया, वार्ड इंचार्ज को उसने कहा “ॲंकल मेरे बाबा के हाथ पर सूजन आ गई है और ख़ून निकल रहा है।” वार्ड इंचार्ज उस बच्चे को अनदेखा करके नर्सों के साथ बातों में मगन था।
बच्चे ने जब देखा तो वह उससे सीनियर डॉक्टर के ऑफिस में जाकर सारी बात बता देता है।
सीनियर डॉक्टर दयाशंकर को जैसे ही बच्चे बताया वैसे ही वे चल दिए बच्चे के साथ और उन्होंने देखा तो वह इंचार्ज अभी भी नर्सों के साथ बतियाने में मगन था, सीनियर डॉक्टर दयाशंकर जी ने उसे डाॅंटा और बच्चे के साथ उसके दादाजी के पास गए। उन्होंने देखा तो पाया कि बच्चे के दादाजी को जो ड्रिप चढ़ाई जा रही थी उसकी सुई हाथ की नस में सही से नहीं लगी थी जिससे नस में सूजन आ गई थी और थोड़ा ख़ून भी निकल रहा था। सीनियर डॉक्टर दयाशंकर जी ने इसे ठीक किया और चले गए।
जैसे ही सीनियर डॉक्टर दयाशंकर जी चले गए तो वार्ड इंचार्ज ने उस बच्चे को अपने पास बुलाया और उसके सिर पर स्टेथोस्कोप मार कर बोला, “अगली बार मेरे शिकायत करी न तो बुरी तरह से तेरी पिटाई करूॅंगा चल भाग अब यहाॅं से। साले न जाने कहाॅं से चले आते हैं।”
बच्चा तुरंत सीनियर डॉक्टर दयाशंकर के पास गया और उनको बताया, कि कैसे वार्ड इंचार्ज ने उसके साथ मिसबिहेव किया।
अब सीनियर डॉक्टर दयाशंकर को बहुत गुस्सा आया, वे वार्ड इंचार्ज के पास गए और उसे कहा, “यह तुम्हारे लिए लास्ट वाॅर्निंग है और तुम तो क्या कोई भी इस बच्चे को परेशान नहीं करेगा यह बच्चा वैसे ही बहुत परेशान है। इसलिए इसे कोई परेशान नहीं करेगा और अब अगर इसे परेशान किया तो परेशान करने वाले के लिए ठीक नहीं होगा।
बच्चे का साहस देखकर अन्य स्टाफ और पेशेंट के साथ संबंधियों ने उसे बच्चे की प्रशंसा की।
आज का दिन बच्चे के लिए कठिन था और उसके दादाजी भी स्वस्थ नहीं हुए थे लेकिन उसे इस बात का संतोष था कि उसके लिए सीनियर डॉक्टर दयाशंकर ने उसका पक्ष लिया और उसका साथ दिया। अब वह सीनियर डॉक्टर दयाशंकर पर भरोसा करने लगा था। उसे यह भरोसा था कि डॉक्टर दयाशंकर उसके दादाजी को ठीक कर देंगे। जैसे-तैसे दिन बीता, रात हुई और वह बच्चा अपने दादाजी के बेड के पास ही सो गया।
प्रथम चरण: अज्ञान (भौतिक सुखों का भोग) अध्याय १: अज्ञान का स्वरूप और उसकी मिठास। अध्याय २: इन्द्रियों का जाल और क्षणभंगुर सुख।
द्वितीय चरण: ज्ञान (एकांत और अंतर्मुखता का उदय) अध्याय ३: जब सत्य से सामना होता है। अध्याय ४: भीड़ में अकेलापन और भीतर की खोज।
तृतीय चरण: वैराग्य (दुखों का रूपांतरण) अध्याय ५: दुःख से विरक्ति तक की यात्रा। अध्याय ६: मोक्ष का सूक्ष्म मोह।
चतुर्थ चरण: निर्मोही (समस्त बंधनों से मुक्ति) अध्याय ७: आत्मा और परमात्मा के पार। अध्याय ८: सर्वोच्च सोपान: निर्मोही।
भूमिका (Introduction / Preface):अज्ञानी से निर्मोही तक का सार
“अज्ञान में ही भौतिक सुखों का उपभोग होता है। ज्ञान जितना प्रखर होता जाता है, व्यक्ति उतना ही एकाकी और अंतर्मुखी होने लगता है। आरंभ में यह अकेलापन दुःख को जन्म देता है, किंतु धीरे-धीरे यही दुःख ‘वैराग्य’ में परिवर्तित हो जाता है। यद्यपि वैराग्य और मुक्ति की अभिलाषा अर्थात् मोक्ष की अभिलाषा भी एक प्रकार का मोह ही है; अतः इससे ऊपर उठकर ही मनुष्य ‘निर्मोही’ बनता है।
एक निर्मोही सिद्ध पुरुष को न स्वादिष्ट भोजन, सुन्दर वस्त्र और बड़े आवास की लालसा रहती है, न ही देह, आत्मा और परमात्मा का बंधन। उसके लिए स्वर्ग-नरक, पुण्य-पाप, पुनर्जन्म और मोक्ष—किसी की भी सार्थकता नहीं रह जाती। निर्मोही हो जाना ही मनुष्य के लिए चैतन्य का सर्वोच्च सोपान है।”
“निर्मोही हो जाना ही मनुष्य के लिए चैतन्य का सर्वोच्च सोपान है।”
मधुमक्खियाँ और भँवरे पौधों में परागण की प्रक्रिया में सबसे महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। वे फूलों से रस (Nectar) लेते समय पराग कणों को एक फूल से दूसरे फूल तक पहुँचाते हैं। दुनिया की लगभग एक-तिहाई खाद्य फसलें, जैसे फल, सब्जियाँ, मेवे (nuts) और बीज, परागण के लिए मधुमक्खियों पर निर्भर हैं। इनके बिना कई जंगली पौधे विलुप्त हो सकते हैं, जिससे पारिस्थितिकी तंत्र असंतुलित हो जाएगा। मधुमक्खियों के कारण फसलों की उपज में 15 से 30 प्रतिशत तक की वृद्धि होती है। ये परोक्ष रूप से पौधों की वृद्धि में सहायक होकर प्रकाश संश्लेषण (photosynthesis) और ऑक्सीजन उत्पादन में योगदान देते हैं, जो पृथ्वी पर जीवन के लिए आवश्यक है।
संक्षेप में, मधुमक्खियाँ और भँवरे प्रकृति के सबसे मेहनती कार्यकर्ता हैं। यदि ये कहीं न जाकर केवल अपने आवास में रहें, तो क्या प्रकृति को कोई लाभ होगा?
ठीक इसी प्रकार मारवाड़ी, यूपी वाले, एमपी वाले और बिहारी जब अपना घर छोड़कर किसी और राज्य में जाकर काम करते हैं, तो वहाँ की अर्थव्यवस्था में योगदान देते हैं, जिससे राजकीय कोष में वृद्धि होती है। इसके साथ-साथ स्थानीय लोगों को किराया मिलता है और वे वहाँ अपनी आवश्यकताओं पर धन ख़र्चकरते हैं, जिससे स्थानीय लोगों की आय बढ़ती है। वे जो भी कमाते हैं, उसका लगभग 80 से 90 प्रतिशत हिस्सा उसी राज्य की स्थानीय अर्थव्यवस्था में वापस ख़र्च हो जाता है; और वे केवल 10 प्रतिशत ही बचा पाते हैं।
इसे एक उदाहरण से समझते हैं। मेरे सामने वाले मकान में एक कमरे का किराया 10,000 रुपये है। उसमें दो सिक्योरिटी गार्ड रहते हैं। एक व्यक्ति के हिस्से में 5,000 रुपये किराया, आने-जाने का ख़र्च कम से कम 1,500 रुपये, खाने का 3,000 रुपये और अन्य विविध ख़र्च 500 रुपये आते हैं। मुझे ये ख़र्चे ज्ञात थे, इसलिए मैंने उनकी सैलरी पूछी (जबकि मुझे उनकी सैलरी पहले से पता थी, क्योंकि उसी एजेंसी के गार्ड वहाँ भी हैं जहाँ मैं काम करता था)।
गार्ड ने बताया कि 12 घंटे की ड्यूटी की सैलरी 10,000 रुपये है। मैंने पूछा, “इतना तो तुम्हारा ख़र्च है, फ़िर घर क्या भेजते हो?” उन्होंने कहा कि वे दूसरी जगह भी एक और शिफ्ट में ड्यूटी करते हैं, जहाँ से उन्हें 10,000 रुपये और मिल जाते हैं।
मैंने हैरानी से पूछा, “तो भाई, सोते कब हो?”
उनका उत्तर दिल को झकझोर देने वाला था:
“अत्यंत कठिन होता है निज आवास छोड़ प्रवास करना, तड़प-तड़प कर जीना होता है, कठिन होता है श्वास भरना।”
“जब सोने का दिन आएगा, तब हमेशा के लिए सोना पड़ेगा, अभी काम न किया, तो परिवार को और मुझे रोना पड़ेगा।”
“उनकी इस कठिन परिस्थिति को मैंने अनुभव किया है और मेरा मानना है कि हमें मिलकर इसे समझना होगा। इस लेखन का सार यही है कि हमें इन प्रवासियों का महत्व समझना चाहिए। इनसे घृणा करना स्वयं की उन्नति और प्रगति को ठुकराने के समान है। ये हमारे देश के ‘श्रम-कुबेर’ हैं, जिनके कठिन परिश्रम से ही देश के ‘धन-कुबेर’ और अर्थव्यवस्था समृद्ध होते हैं। जिस प्रकार मैंने यह विषय आपके सम्मुख रखा है, आप भी इसे अन्य लोगों तक पहुँचाने का प्रयास करें।“
अध्याय (Chapter) 1: ग्रहण का आरंभ (The Beginning of the Eclipse)
अस्पताल में पहला दिन: अस्पताल चैरिटेबल ट्रस्ट का था अतः वहाॅं पर निर्धन और असमर्थ लोगों के उपचार की व्यवस्था थी। अस्पताल में काम करने वाले स्टाफ के लोग अच्छे थे उन्होंने उस बच्चे के दादाजी को एडमिट करवाया और ट्रीटमेंट चालू करवाया। आसपास के अन्य पेशेंट्स के संबंधियों ने जब देखा कि इतना छोटा बच्चा अकेला अपने दादाजी के साथ है और परेशान है तो उन्होंने उसे प्यार से पुचकारा। कुछ लोगों ने कुछ खाने को दिया। जैसे-तैसे पहला दिन बीता। बच्चे के मन में आस जगी कि अब दादाजी ठीक हो जाऍंगे।
4. No smoking, alcohol, supari, or tobacco/gutkha habits.
5. Live like the king of a virgin queen, not a puppet of a whore, or stay proudly alone like a king without marriage.
A queen always treats her husband like a king; that’s why she is a queen, but if a woman treats a man like a puppet, then she is the wife of a puppet.
My brothers, always remember with pride: a king without a queen is still a king.
6. Care about nature and every living being as long as a living being does not harm him.
7. Not dependent on public opinion, attention, or validation.
8. Fewer friends or no friends means a sigma male.
9. Takes risks and doesn’t like to stay in his comfort zone.
10. Not dependent on the name of his father or other references; make everything by your own efforts, whether it’s name, fame, or any game.
11. Is more spiritual than before, as a teenager or atheist, because a person, after becoming an adult, often takes on the shadow of spirituality to hide his sins.
Having the above qualities, a man is a self-controlled, strong-minded person.
7 साल पहले इत्तेफ़ाक से… मैं मिला उस नापाक से, बात हुई, मुलाक़ात हुई, और उसने इज़हार किया, हाँ, मैं भी हैरान था कि उसने इज़हार किया, मैंने हल्के मैं लिया बात को, हावी न होने दिया ज़ज्बात को…
लेकिन उसने कहा, “मैं बाक़ी लड़कियों जैसी नहीं, धोखा देके छोड़ दूॅंगी ऐसी नहीं, तुम्हें मेरी वजह से कभी दुःख के ऑंसू न होंगे ये क़सम रही”, कब तक मैं ना कहता, मुझे भी उसकी बातों से लगा कि शायद मेरी है सनम यही…
और तब से मेरी बर्बादी की शुरुआत हुई, मेरे पास तरक़्क़ी के बहुत मौक़े आए, लेकिन ख़ुद के फ़ायदे के लिए वो बोली, “छोड़कर मत जाना, तुम बिन रह ना पाऊँगी, मर जाऊँगी”, अपने सपने छोड़, तरक़्क़ी की राहों से लेके मोड़, मैंने उसका साथ निभाया, क़ुर्बानी से उसको क़ाबिल बनाया… और फ़िर इक ऐसा दिन आया…
उसने दौलत के ख़ातिर किसी और से रिश्ता जोड़ दिया, मेरा दिल तोड़ दिया और मुझे मरने की हालत में छोड़ दिया, मैं मरीज़-ए-इश्क़ था, दाख़िल था हॉस्पिटल में, और वो कर रही थी अय्याशी होटल में, मैंने जिसे जान माना वो मौत सी हो गयी और उसने मार दिया मुझे उसी पल में…
इश्क़ ना करना मेरे दोस्तों अगर ज़िन्दगी जीना चाहते हो, इश्क़ ना करना अगर कोई मुकाम हासिल करना चाहते हो, और फ़िर भी तुम्हे इश्क़ करना हो तो अच्छे से सोच लेना, क्यूँ ऐसे बर्बाद होके किसी बेवफ़ा के लिए मरना चाहते हो…
ये कोई कविता या शायरी की बात नहीं, मैंने असलियत में गुज़री हुई बात कही, इश्क़ करके मैं बर्बाद हुआ हूँ बुरी तरह, लगती है फ़िल्मी मग़र है ये है बात सही…
जो दुनिया की भीड़ में ख़ुद को अकेला पाते हैं, मैं यहाँ उन टूटे हुए लोगों का हौसला बढ़ाने आया हूँ, इश्क़, प्यार, और मोहब्बत सिर्फ़ अपनी ख़ुद-ग़रज़ी के लिए करते हैं लोग, ये बात समझाने आया हूँ, कोई और मासूम किसी ज़ालिम बेवफ़ा से इश्क़ निभाते हुए मेरी तरह बे-तहाशा बर्बाद न हो जाए, कोई माता-पिता का सहारा है तो कोई अनाथ बेसहारा है, ऐसे मासूमों को बेवफ़ा से बचाने आया हूँ।
लेखक की कलम से (The Author’s Note)
नमस्ते दोस्तों, मैं हूँ जय मार्तण्ड ‘मिहिर’ (Jay Maartand ‘Mihir’)। आज जब मैं अपनी कलम उठाता हूँ, तो पीछे 8-10 साल का वो लंबा संघर्ष दिखता है जो इलेक्ट्रॉनिक्स रिटेल की चकाचौंध से शुरू होकर ख़ुद को तलाशने की इस एकांत यात्रा तक पहुँचा है। मेरा मानना है कि हर इंसान के भीतर एक सूरज होता है, जिसे अक्सर हालातों का ग्रहण घेर लेता है। मेरी ज़िंदगी में भी वो ‘7 साल’ आए, जिन्होंने मुझे मरीज़-ए-इश्क़ बनाकर हॉस्पिटल के बिस्तर तक पहुँचा दिया। लेकिन उसी राख से जन्म हुआ ‘The BornFighter’ का। मैं कोई बड़ा दार्शनिक नहीं हूँ, बस एक ऐसा इंसान हूँ जिसने अपनों को खोकर ख़ुद को पाया है। मैं यहाँ उन टूटे हुए लोगों का हौसला बढ़ाने आया हूँ जो दुनिया की भीड़ में ख़ुद को अकेला पाते हैं। मेरी कहानियाँ और नज़्में महज़ शब्द नहीं, बल्कि मेरे जीवन के वो अनकहे और अनसुने (Unknown and unheard) सच हैं जो अब मेरी आने वाली किताब ‘The BornFighter’ के माध्यम से आप तक पहुँचेंगे।
“ये पंक्तियाँ महज़ एक कविता नहीं, बल्कि उस ‘सूर्य ग्रहण’ की एक झलक हैं जिसने मेरे वजूद को अंधेरे में धकेल दिया था। 7 साल की इस बर्बादी के बाद, जब जीने की कोई वजह नहीं बची थी, तब एक ऐसी कहानी का जन्म हुआ जिसे दुनिया ने अब तक न सुना है, न देखा है। ‘द बोर्नफाइटर’ (The BornFighter)—यह सिर्फ मेरी कहानी नहीं, बल्कि हर उस इंसान की दास्ताँ है जो टूटकर बिखरने के बाद फ़िर से खड़ा होना चाहता है। यह तो बस शुरुआत है… इस तबाही के पीछे के सस्पेंस और ‘मिहिर’ के ‘बोर्नफाइटर’ बनने के सफ़र को जल्द ही आप मेरी आने वाली किताब ‘The BornFighter’ में विस्तार से पढ़ेंगे। जिसके दो भाग होंगे। क्या आप तैयार हैं उस अंधेरे से रूबरू होने के लिए, जिसने मुझे ‘BornFighter’ बनाया? जुड़े रहें, क्योंकि कहानी का असली पन्ना अभी पलटना बाकी है।”
मुझसे और मेरे इस सफ़र से जुड़ने के लिए आप मेरी वेबसाइट jaymaartand.com पर आ सकते हैं। सफ़र लंबा है, पर अब मैं अकेला नहीं हूँ…
मेरी कलम मेरे साथ है।
We invite you to connect with Jay Maartand ‘Mihir’ on LinkedIn, Facebook, Instagram, and YouTube.
वेबसाइट: jaymaartand.com लेखक: जय मार्तण्ड ‘मिहिर’ (Jay Maartand ‘Mihir’)
You must be logged in to post a comment.